शीतलामाता
त्रितापों कि शांति के लिए करे शीतलामाता कि पूजा
शीतलामाता के अवशर पर सूर्यनगरी में कागा स्थित शीतलामाता मंदिर में सात दिवसीय मेला शुरू हो जाता है। शीतलाष्टमी के दिन महागौरी कि आराधना कि जाती है। यह पूरी सृष्टि का पर्व है। और नई फसलो का जन्म इसी घड़ी से होता है। देवी देवी लक्ष्मी धनोर अन्न का प्रतीक है। वह हम पर प्रसन्न रहे। घर,धन व् अन्न से सम्पन्न रहे। यही कामना करनी चाहिए। शिशुओ को औरी,टीवी , आदि विविध शारीरिक बीमारियो से बचाने के लिए शीतला माता पूजन से एक दिन पूर्व बना ठंडा भोजन बटोर परसादी गरहन किया जाता है।
भगवती देवी कि जिन शक्तियो का उल्लेख बार - 2 किया जाता है। उनमे एक शीतलामाता भी है। होली के बाद इनकी आराधना कि है। ताकि वह हम सब को त्रितापों से बचाए। होली के बाद ही बसोड़ा पूजा जाता है। जो महालक्ष्मी कि ही आराधना का पर्व है। महालक्ष्मी ही शीतलामाता का है। प्राणी इनकी इच्छा व् अनिच्छा से ही कार्य करता है। यह प्रकृति से संबोधित है। प्राकृतिक उथल - पुथल का स्वरूप शैलपुत्री का है। शैलपुत्री कि आराधना ही प्रकृति कि पूजा है। शैलपुत्री कि आराधना पर्यावरण कि और ध्यान आकृष्ट करती है। भले ही आज संसार में पर्यावरण के प्रति चिंता व्यक्त कि जा रही है। लेकिन भारतीय संस्कृति समय - 2 पर सावधान करती है।
ऐसे करे पूजा
भू माता के थान (स्थान ) पर जाकर हल्दी के पाच थाप लगाये। ये पाच थाप तत्वो कि पूजा करना तो संभव नही हो पता इसलिए हल्दी के पांच थाप लगाकर ही पंचतत्वों को प्रतीक मानकर पूजा क्र ली जाती है। हल्दी,मुंग कि दाल , रोली , चावल ,गेहू आदि से माता शीतला कि पूजा करे फलाहार करके शाम को व्रत का परायण करे।
महालक्ष्मी के सभी स्वरुप प्रकृति से है। उनमे तीनो मुख्य स्वरुप सप्तमी (कालरात्रि )अष्ठमी (महागौरी )नवमी (सिध्दिदात्री )प्रकृतिके ही उत्सव है। काल को वश में करने वाली कालरात्रि है। माता शीतला कि पूजा - अर्चना से आध्यात्मिक शांति शांति मिलती मिलती है।
शीतलामाता कि आरती
तन भी शीतल,मन भी शीतल जो शीतलता वर्षाती है
आरती करो माँ शीतला कि ये हर भक्तो को भाती है
जब महाभयानक ताप बढा , जब धरती माँ अकुलाई थी
गर्धव से धीरे -2 चली माँ कड़े धाम में आए थी
शीतलता अपनी फैलाकर माँ खड़े - खड़े मुस्काती है
आरती करो माँ शीतला कि ये हर भक्तो को भाती है
भगवान ने भेजा था इनको भक्तो का भाग्य बनाने को
जो सुलग रहा सन्मार्ग यहाँ उस पर हरियाली लाने को
इस मृत्युलोक कि करी रक्षा, उन लीगो में भी भाती है
स्नान करा गंगा जल से ,जो माला फूल चढ़ाते है
माँ प्रसाद घर में , परिवार के साथ जो पाते है
गुरुदेव उन सब को रोज खुशहाली लती है
आरती करो माँ शीतला कि ये हर भक्तो को भाति है
www.panditnmshrimali.com
mail:- contact@panditnmshrimali.com
info@panditnmshrimali.com
Contact no.- 09571122777, 09929391753
त्रितापों कि शांति के लिए करे शीतलामाता कि पूजा
शीतलामाता के अवशर पर सूर्यनगरी में कागा स्थित शीतलामाता मंदिर में सात दिवसीय मेला शुरू हो जाता है। शीतलाष्टमी के दिन महागौरी कि आराधना कि जाती है। यह पूरी सृष्टि का पर्व है। और नई फसलो का जन्म इसी घड़ी से होता है। देवी देवी लक्ष्मी धनोर अन्न का प्रतीक है। वह हम पर प्रसन्न रहे। घर,धन व् अन्न से सम्पन्न रहे। यही कामना करनी चाहिए। शिशुओ को औरी,टीवी , आदि विविध शारीरिक बीमारियो से बचाने के लिए शीतला माता पूजन से एक दिन पूर्व बना ठंडा भोजन बटोर परसादी गरहन किया जाता है।
भगवती देवी कि जिन शक्तियो का उल्लेख बार - 2 किया जाता है। उनमे एक शीतलामाता भी है। होली के बाद इनकी आराधना कि है। ताकि वह हम सब को त्रितापों से बचाए। होली के बाद ही बसोड़ा पूजा जाता है। जो महालक्ष्मी कि ही आराधना का पर्व है। महालक्ष्मी ही शीतलामाता का है। प्राणी इनकी इच्छा व् अनिच्छा से ही कार्य करता है। यह प्रकृति से संबोधित है। प्राकृतिक उथल - पुथल का स्वरूप शैलपुत्री का है। शैलपुत्री कि आराधना ही प्रकृति कि पूजा है। शैलपुत्री कि आराधना पर्यावरण कि और ध्यान आकृष्ट करती है। भले ही आज संसार में पर्यावरण के प्रति चिंता व्यक्त कि जा रही है। लेकिन भारतीय संस्कृति समय - 2 पर सावधान करती है।
ऐसे करे पूजा
भू माता के थान (स्थान ) पर जाकर हल्दी के पाच थाप लगाये। ये पाच थाप तत्वो कि पूजा करना तो संभव नही हो पता इसलिए हल्दी के पांच थाप लगाकर ही पंचतत्वों को प्रतीक मानकर पूजा क्र ली जाती है। हल्दी,मुंग कि दाल , रोली , चावल ,गेहू आदि से माता शीतला कि पूजा करे फलाहार करके शाम को व्रत का परायण करे।
महालक्ष्मी के सभी स्वरुप प्रकृति से है। उनमे तीनो मुख्य स्वरुप सप्तमी (कालरात्रि )अष्ठमी (महागौरी )नवमी (सिध्दिदात्री )प्रकृतिके ही उत्सव है। काल को वश में करने वाली कालरात्रि है। माता शीतला कि पूजा - अर्चना से आध्यात्मिक शांति शांति मिलती मिलती है।
शीतलामाता कि आरती
तन भी शीतल,मन भी शीतल जो शीतलता वर्षाती है
आरती करो माँ शीतला कि ये हर भक्तो को भाती है
जब महाभयानक ताप बढा , जब धरती माँ अकुलाई थी
गर्धव से धीरे -2 चली माँ कड़े धाम में आए थी
शीतलता अपनी फैलाकर माँ खड़े - खड़े मुस्काती है
आरती करो माँ शीतला कि ये हर भक्तो को भाती है
भगवान ने भेजा था इनको भक्तो का भाग्य बनाने को
जो सुलग रहा सन्मार्ग यहाँ उस पर हरियाली लाने को
इस मृत्युलोक कि करी रक्षा, उन लीगो में भी भाती है
स्नान करा गंगा जल से ,जो माला फूल चढ़ाते है
माँ प्रसाद घर में , परिवार के साथ जो पाते है
गुरुदेव उन सब को रोज खुशहाली लती है
आरती करो माँ शीतला कि ये हर भक्तो को भाति है
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